दोहरा मापदंड
पिछले लगभग दो
सालों से देश
में आराजकता ,असिष्णुता
और अधिनायकत्व का
बोलबाला जोरो से
है। इस बहस
में कोई पीछे
नहीं है चाहे
वो मीडियाकर्मी हो
या फिर राजनीतिक
पार्टिया अब तो
फ़िल्मी हस्तियां भी काफी
दिलचस्पी लेने लगे
है। दोहरा मापदंड तो आज़ादी
के बाद देश
-विभाजन से ही
शुरू हो गया
था लेकिन उसका
परिणाम अब देखने
को मिल रहा
है। संविधान का
आदर करते हुए
मैं कहना चाहूंगा
की भारत एक
धर्मनिरपेक्ष राज्य होना ही
नहीं चाहिए क्योंकि
मेरे ख्याल से
कोई भी धर्म
हिंसा और अशांति
का प्रचार नहीं
करता।आज परिस्तिथि ये हो
गई है की
अगर आप आज
न्यूज़ चैनल देखे
तो आपको कांग्रेस,भाजपा या फिर
लेफ्ट की ही
न्यूज़ चैनलों को
देखने का मौका
मिलेगा। सभी पार्टियों
ने अपना-अपना
हक़ हर चैनलों
पे जमा रखा
है। जैसे देश
के सामने अगर
सच्चाई रखनी हो
तो कुछ चैनल
खुद के टीवी
में अन्धकार कर
लेते और सच्चाई
की तुलना अन्धकार
से ही कर
बैठते है।अविव्यक्ति की
आज़ादी मतलब अगर
आप किसी एक
धर्म-संप्रदाय को
लेकर बोले तो
मालदा जैसी हिंसा
के लिए तैयार
हो जाये और
अगर राम -कौसल्या
पे भद्दी टिपण्णी
की तो ये
अविव्यक्ति की स्वतंत्रता
है। जैसे कुछ
राजनैतिक पार्टी ने तो
राम पर ही
अपना हक़ जमा
कर रखा है
और आज तक
राम के नाम
पर वोट ले
रहे,पर राम
किसी पार्टी विशेष
की जागीर नहीं
वो तो एक
आदर्श है। मैं
राजनीती में प्रखर
तो नहीं परतु
आज के समाचार
चैनलों को देख
कर सफल जरूर
हो सकता हु।आज
विपक्ष की ये
हालत हो गयी
है की अगर
आज प्रधानमंत्री ने
कहा मेरी सरकार
अच्छा काम नहीं
कर रही तो
विपक्ष बोलेगी प्रधानमंत्री जी
आपकी सरकार
अच्छा काम कर
रही है।जब बहस
की बात आती
तो कुछ विश्वविद्यालय
में बुर्का-प्रणाली
वेश की बात
ही नहीं होती
और वही पर्दा-प्रणाली पे बात
आती तो "Right to Equality" कह कर
बात को टाल
देते और कहते
ये तो गलत
है। कुछ महीने
पहले बंगाल के
मदरसे में क़ाज़ी
मासूम अख्तर की
इसलिए पिटाई कर
दी गयी कि
वो मदरसे में
राष्ट्रगान सीखा रहा
था। मतलब साफ़
है अगर आप
राष्ट्रगान का अपमान
करे तो कानून
सजा देगा और
राष्ट्रगान सीखने का प्रयास
करे तो कट्टरपंथी
पीटने लगेंगे। ये
कैसा धर्मनिरपेक्षता है
?जब मुंबई के
सिलसिलेवार धमाकों को जब
किसी पत्रकार ने
मुस्लिम टेररिज्म का नाम
दिया तो कुछ
खुले ख्याल वाले
लेखकों ने ये
कह कर आपत्ति
जताई की आतंकवाद
का तो कोई
धर्म ही नहीं
होता वही एक
तरफ प्रो कलबुर्गी
की हत्या के
लिए हिन्दू शब्द
का प्रयोग होता
है। ये तो तय
है की कुछ भारतीय
मीडिया को दोहरा
चरित्र का मानस
पुत्र कहना
गलत नहीं होगा
क्योंकि जब नेपाल
भयावह भूकम्प से
झूझ रहा था
तब मीडिया का दोहरा
मापदंड के वजह
से नेपाली लोगो
ने #GOHomeIndianMedia नाम से
कैंपेन चला मीडिया
का
दोहरा चरित्र देश
के सामने रखा
था।एक छोटा सा
मुद्दा मिल जाये
एक महीने का
खुराक पूरा हो
जाता है जैसे
की अभी "भारत
माता की जय
"पर चल रहा
था।भारत,जो शुरू
से ही मातृसत्ता
देश रहा है
और यहाँ पुरुष
से पहले माताओं
और बहनो को
सम्मान दिया जाता
है।अगर यहाँ किसी
पुरुष का नाम
भी रखना होता
है तो वहाँ
स्त्री शब्द की
प्रधानता पहले
होती है। जैसे
किसी का नाम
सीताराम रखा जाता
रामसीता नहीं ,जैसे किसी
का नाम लक्ष्मीनारायण
होता नारायणलक्ष्मी नहीं,जैसे किसी
का नाम राधाकृष्ण
होता कृष्णराधा नहीं।
सृष्टि की संचालिका
माता से ही
होती है फिर
माता की जय
क्यों न हो
?जैसे हम सब
की माता होती
है वैसे भारत
की भी माता
होती है जिसे
हम भारत-माता
कहते है। जब
हम भारत -माता
की जय की
बात करते तो
उस जय में
भारत भू-भाग
के कश्मीर से
कन्याकुमारी और गुजरात
से असम में
रह रहे सारे
लोगो की सुख-शांति की बात
करते "सर्वजन्य हिताय और
सर्वजन्य सुखाय"की बात
करते है,चाहे
वो हिन्दू,मुसलमान
या फिर ईसाई हो।अब
तो भारत माता
पर भी राजनीती
होने लगी है
अगर आप भारत
माता की जय
की बात करेंगे
तो लोग आपको
किसी एक दल
से जोड़ देंगे।जिस
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा माना जाता था आज कही न कही मीडिया का दोहरा चरित्र
लोकतंत्र को कमजोर बना रहा है।जिस मीडिया को खबरों की पावनता में गंगा होना था वो आज
हर गली,चौक -चौराहों पर बिकने को तैयार है।जिस मीडिया को गूंगे की आवाज़ और अंधे की
लाठी बननी चाहिए वो आज लगातार लोकतंत्र की संप्रभुता और अखंडता पर चोट मार रहे है।
वैसे कुछ NGO भी इस खेल में पीछे नहीं
है तीस्ता सीतलवाड़ की संस्था सिटीजन्स फॉर जस्टिस एन्ड पीस (CJP) ने गुजरात दंगा के
लिए नरेंद्र मोदी के खिलाफ याचिका तो डाली परन्तु यही लोग गोधरा जैसे अमानवीय दंगो
पर कहा थे ?क्या ये मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं है ?अब तो मिडिया का भी विशलेषण होना
चाहिए क्योंकि जब राजधानी दिल्ली में कुछ दरिंदे चीरहरण में लगे थे तब यही मीडिया कोई
फ़िल्मी कलाकार के बच्चे के नामकरण में लगी हुई थी। देश की जनता को इनसे वाकिफ होना पड़ेगा की मीडिया हाउस आज ब्लैकमेलिंग
का धंधा बन गयी है। फिर से मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्बा बनना होगा और सत्य और
निष्पक्ष लिखना चाहिए।
