Friday, February 9, 2018

यमुना की पीड़ा

                    (यमुना की पीड़ा)
क्या देख रहा है मुझकों तू, मैं यमुना हूं मैली सी,
किसी युग में मैं भी, रहती थी आनंदी सी।

यमुनोत्री से निकल कर मैं,प्रयाग में मिल जाती हु,
और साथ-साथ कई बहनों को,नई जीवन दे जाती हूं।

मैं ही यमुना ,मैं ही जमुना, कालिंदी और सूर्यसूता,
मेरे तट पर न जाने कितने संतो ने चंडी पाठ पढ़ा।

श्याम वर्ण सी पैदा हुई, ब्रज मंडल की रानी हूं
कृष्ण की भक्ति करती हूं, बस कृष्णा की पटरानी हु।

आज हाल देखकर मेरा ये, क्यों तू विचलित सा नहीं होता?
न जाने कितने नाले, और कचड़े का प्रवाह मुझमे होती।

मैं ही वो यमुना हु, जो कालिया नाग का विष पिया,
और न जाने कितने लोगों का, मैंने अनुरोध लिया।

पहले कृष्ण के मुरली रागों से, खूब झूमा करती थी,
आज प्रदूषण के कहर से, खुद को कोसने लगती हूं।

माँगती हूं तुझसे एक वचन, तुम मेरा एक उपकार करो,
मेरे जल को, मेरे तट को, पुनः त्वरित उद्धार करो।

फिर अपने लहरों से तुझको, दरिया का बोध कराऊँगी, साथ-साथ गाँव-नगरों को, स्वच्छ बनाकर जाऊंगी।
                    :-रौशन

Friday, February 2, 2018

नव वर्ष 2075 एवं वसंत ऋतु पर मेरे द्वारा लिखी कविता


हे सखा! माघ बाद तेरा अवलोकन हुआ,
तेरे स्पर्श से मानो, सम्पूर्ण काया सक्रिय हुआ।
वृक्ष भी नव रूप धारण किये किकोल रहा है,
जैसे नूतन वर्ष अभिनंदन आन पड़ा है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का हो रहा आरम्भ,
और साथ एक नव युग का उत्साह-उमंग।
हर खेत और बाग़ हो रहा स्वर्ण जैसा अलंकृत,
 प्रकृति का आँगन भी हो गया सुशोभित।
पक्षियों ने भी 'राग बसंत' का बाण छोड़ा है,
नव वर्ष के गीतों से आया नया सबेरा है।
यह देख पर्वतराज हिमालय भी पिघल गया,
जान्हवी से बिछुड़ने का दुःख उसे भी हुआ।
ठंड से ठिठुरे विहंग, अब उड़ने का बहाना ढूंढ रहे,
जंगलों के सारे वृक्ष भी, अब नव पल्लव पाल रहे।
अंधकार भी अपना साम्राज्य समेटने लगा,
ऋतुओं का राजा, वसंत जो आ गया।
                                                       :- रौशन