Thursday, March 3, 2016

जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय की बहस सन 2016 की बहुचर्चित मुद्दा बन गयी है। समाचार-पत्रो,पत्रिकाओ और टेलीविज़नो में सुबह से शाम तक एक ही मुद्दे पर बहस चलते रहती। आखिर ये बहस करने वाले कौन है?और ये बहस किसके लिए होती है?क्या शिक्षा के लिए बहस होती है?क्या रोजगार के लिए बहस होती है ?बहरहाल इस बहस में लगभग तीन लोग जरूर सामने आये है। रविश कुमार (पत्रकार),राकेश सिन्हा(दिल्ली विश्विद्यालय,प्रोफेसर एवं संघ विचारक)और कन्हैया कुमार(.ने.वि,छात्र संघ अध्यक्ष) ये तीनो बिहार के उन तबको,गावों और शहरों से ताल्लुक रखते है,जहाँ लोगो को तो पीने को स्वच्छ पानी मिलता ही दो वक़्त की रोटिया।बिहार जो शुरू से मगध साम्राज्य ,देश के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य में से एक था। जहा गुप्तवंश और मौर्यवंश ने सालो तक राज किया।आज उस बिहार की अस्मिता को कही कही इन वैचारिक लोगो की नजर लग गयी है। कुछ पत्रकार टीवी स्टूडियो में बैठकर सरकार की नीतियों का विरोध करते और जब समाधान की बात आती तो विचार से ही काम चला लेते।भारत में रोजगार से प्रथम विचार हो गयी है ,पहले मार्क्सवाद और उदारवाद अब तो गांधीवाद और अम्बेडकरवाद भी गए है। अगर अभी गांधीजी और अम्बेडकरजी जिन्दा होते तब उन्हें एहसास होता की उनके विचारो को खंडित कर ये वैचारिक लोग कैसे समाज के सामने रखते है। जैसे कुछ संगठन ने तो भगत सिंह के बसंती चोले को लाल रंग में तब्दील कर दिया है। ये बात अलग है की भगत सिंह की क्रांति ये राष्ट्र को आज़ाद कराना था और उनके नाम पर वोट मांगने वाले राष्ट्र की ही खंडित होने की बात करते है।मेरे अनुसार कोई भी बिहारी या पूर्वांचली अपनी उच्च शिक्षा लेने अपने राज्य से निकालकर दिल्ली या हैदराबाद जाता उस समय उसकी कोई विचारधारा नहीं होती और वो वैचारिक दृष्टि से कमजोर होता। वो अपने परिवार के उत्थान के लिए डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहता परन्तु कुछ संगठन क्रांति के नाम पर उसे क्रांति के  कुआ में फेक देते और सौम्यवाद और नारीवाद की पाठ पठाते। वो सामाजिक समरसता का बात करते परन्तु मुझे आज तक समझ नही आया जब समानता की बात होती तब एक छात्र को दलित कह कर पुकारना कहा की समरसता है ?क्या ये हम सभी छात्रों का अपमान नही है ?लेकिन जो भी हो ये मार्क्स के विचार नहीं हो सकते कोई अलग ही विचार लगता है। मेरा सवाल उन सारे बुद्धिजीवी बिहार के लोगो से है जो नॉएडा,बंगलोर या सिलिकॉन वैली में बैठ कर बिहार की राजनीति को कोसते है और जब अपनी नैतिक जिम्मेदारी की बात आती तो कोई आगे नही आता। मेरा सवाल उन सारे बिहारी और पूर्वांचली से है जो दिल्ली के नगरपालिका आवास या फिर निजी आवास में रह रहे है और वहाँ पर असुविधा मिलने पर वहाँ के सरकार या राज्य सरकार को कोसते है परन्तु यही लोग अपने राज्य जाकर वहाँ के राज्य सरकारों से अपनी रोज़ी-रोटी क्यों नहीं मांगते ?अगर ये बुद्धिजीवी लोग अपनी नैतिक जिम्मेदारी उठा चुनाव में भी अपनी नैतिकता दिखाया होता तो बिहार की दुर्दशा कुछ अलग ही होता। खैर मैंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी का पालन किया। अब ये तय बिहार के युवको और जनता को करना होगा की वो अपने राज्य में उद्योग और रोजगार की लड़ाई लड़े या फिर विचार से ही अपना काम चला ले।  विचार भी तब काम आती है जब हमारे पास रोजगार  होगी विचार भी तब काम आएगी जब हमारे पास राष्ट्र है जब कुछ लोग राष्ट्र की ही खंडित होने का बात करते है तो वो अपना विचार किसके ऊपर डालेंगे जब राष्ट्र ही नहीं होगा। जिस संगठन की शुरुआत बंगाल और बिहार से हुई थी आज उस राज्य का क्या हाल है जनता और देश इससे वाक़िफ़ है। मेरी ये इच्छा होगी कि मै अपनी शिक्षा पूरी कर वापस अपनी धरती जा वहाँ के किसानों और बच्चों की शिक्षा के लिए काम करुँ। राज्य की तस्वीर तब ही बदलेगी जब गरीब के बच्चों के हाथ से बन्दूको को हटा कलम पकड़ाई जाये। खैर इन शिक्षा और रोजगार के लिए कोई भी टीवी चैनल बहस नहीं करता,होती है तो सिर्फ विचारो की बहस। जरुरत है बिहार के लोगो और समाजों को,कि वो अपने अधिकारों के लिए सजग हो जाए और रोजगार की बात करे विचार की नही। अंत में फिल्म तलाक़ जो1958 में आई थी जिसमे राजेंद्र कुमार और कामिनी कदम मुख्य भूमिका में थे और मन्ना डे साहेब ने सुन्दर सा गीत गाया था चार पंक्ति लिखना चाहूंगा।
       एक बात बतानी है मुझको,ये देश के पहरेदारो से
           संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारो से।
       आती है आवाज़ यहाँ मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारों से

           संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारो से।   

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