Saturday, August 27, 2016

           आर्थिक विषमता

 

पश्चिमी देशो में अर्थनीति का प्रारंभ सिर्फ भौतिक आवश्यकताओ को पूर्ण करने के लिए हुआ है।पूंजीवाद और सौम्यवाद जो खुद को अलग-अलग विचार कहते है दरअसल वो एक सिक्के के ही दो पहलु है।दोनों का मकसद सिर्फ एक ही है श्रम और श्रमिको का उपहास करना।पूंजीवाद एक तरफ कमाई का सारा राजस्व अपने पास रखना चाहता है तो सौम्यवाद राजस्व को मुट्ठी भर लोगो से छीन कर उसका केन्द्रीकरण करना चाहता है।दीन दयाल जी ने एक उदाहरण के जरिये समाजवाद और भारतीय विचार के दर्शन को एक पंक्ति में व्याख्या किये थे सौम्यवाद अर्थात समाजवाद अर्थात कम्युनिज्म का नारा है "कमाने वाला खायेगा"परंतु भारतीय विचार कहती है "कमाने वाला खिलायेगा और जो जन्मा है वो खायेगा" ।भारतीय विचार के आधार का चिंतन करते हुए देश के अर्थव्यवस्था को आत्म निर्भर बना सकते है।                                                                      

                                                  वर्तमान अर्थव्यवस्था :-

वर्तमान अर्थव्यवस्था में मानव के अधिकार का कोई बात ही नहीं है,यहाँ तो सिर्फ पूंजीवाद और सौम्यवाद को ही अधिकार है।वर्तमान अर्थव्यवस्था में मानवीय मूल्यों का कोई मोल नहीं रहा और भौतिक आव्यश्यकता को पूर्ण करने को ही समृद्ध अर्थव्यवस्था कहा जाता है मानव शक्ति के स्थान पर यंत्रो का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है,जिसके कारण असंख्य लोग बेकारी का शिकार हो रहे है।।मानव का सर्वांगीण विकास ही अर्थनीति और अर्थव्यवस्था का लक्ष्य होना चाहिए। अर्थशास्त्र का केंद्र बिंदु सम्पति नहीं मनुष्य होना चाहिए। 1960 के दशक में अमरीका में कंप्यूटर का प्रयोग शुरू हुआ 1970 तक तो सही चला  परंतु 1970 के उपरांत अमरीका की आर्थिक समृद्धि तो बढ़ी परंतु बेकारी की जनसँख्या का भी वृद्धि हुआ।आज भी अमरीका के लगभग २०% लोग गरीबी रेखा के नीचे है और करीब 40 % लोगो को रोजगार प्राप्त नहीं हुई है। 50 %श्रमिको को उनका न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता आज अर्धविकसित  देशो में दूध के उपेक्षा बियर का उत्पादन बढ़ रहा है,सूती कपडे की तुलना में टेरिलीन कारोबार बढ़ रहा है,अच्छे फल पर्याप्त मिल कर जगह जगह रेडियो,टीवी का बाजार सजा है। हमारे सूक्ष्म ,लघु उद्योग के श्रमिक ग्रामीणों क्षेत्रो से निकालकर शहर के झुग्गी में रहने को मजबूर है। अर्थ का अभाव और प्रभाव दोनों मानव के हित में नहीं होता। आज एक किसान जहाँ उसे प्याज़ की कीमत प्रति किलो 5 पैसे मिलता है वही ग्राहक को यही प्याज़ प्रति किलो 20 रुपया खरीदना पड़ता है। आर्थिक विषमता में सटोरिये और बिचौलिये भी शामिल है। एक गन्ना किसान दिन रात मेहनत कर गन्ना की खेती करता है और फिर यही गन्ना का उपयोग शराब बनाने के लिए किया जाता है।जबकि भारत एक ऐसा देश है जो जहाँ शराब पीने वालो की संख्या में वृद्धि निरंतर वेग से हुई है 1992 से 2012 तक देश में शराब पीने वालो की जनसँख्या में 55 % तक वृद्धि हुई है। करीब 30 % भारतीय रोज शराब का सेवन करते है और औसतन एक व्यक्ति एक साल में करीब 6.2 लीटर तक शराब का सेवन करता है।  स्वीडिश अर्थशास्त्र गुर्नार मिर्डाल ने कहा था विकासशील देश में विदेशी सहायता से खड़े होने वाले औद्योगिक प्रकल्प विदेशी ढंग की उत्पादन-प्रणाली पर निर्भर रहे विदेशी प्रणाली से खड़ा होने वाले संसथान स्थानीय सामग्री का उपयोग कर उत्पादन-प्रणाली को विकसित करने का प्रयास कभी नहीं करते है। जब तक सामान्य आवयश्कता पूर्ण नहीं हो जाती तब तक हम अपनी अर्थव्यवस्था में पूर्ण रूप से समृद्ध नहीं हो सकते। भारतीय अर्थव्यवस्था का लाभ तो निजी क्षेत्र को हुआ है सार्वजानिक क्षेत्र को बल्कि विदेशी क्षेत्र को जरूर हुआ है। पहले आवश्यकता के लिए उत्पादन होता था आज वस्तु को उत्पादित करने के उपरान्त मनुष्य की इच्छाये जगाई जाती है। अर्थव्यवस्था में उत्पादन इस प्रकार होना चाहिए की मनुष्य सिर्फ व्यक्ति तक ही सोचे परंतु पुरे समष्टि का विचार करे और भौतिक सुख के अलावा नैतिक एवं आध्यात्मिक सुखों का भी अनुभव ले। क्या हमें ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं बनानी चाहिए जिसमे मानव का विशाल शक्ति बेकार जाये,मानवीय मूल्यों का हनन हो।

                               समृद्धिशाली अर्थव्यवस्था                                            समृद्धिशाली अर्थव्यवस्था तब संभव है जब मनुष्य अपने शारीरिक सुखो के अलावा मन,बुद्धि और आत्मिक सुखो को भी प्राप्त करे। एक देश अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित तब कर सकता है जब देश के सूक्ष्म,लघु उद्योग का विकास होगा। जरुरी नहीं की एक देश की नीति दूसरे देश के लिए लाभप्रद ही हो। भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का ही ढांचा बनना चाहिए। जापान एक ऐसा देश है जो यंत्र का प्रयोग और आयात करने के ब्जाय मानव श्रम का उचित उपयोग किया अपनी पूंजी का संचय किया और उत्पादन के साथ साथ लोगो का क्रय-शक्ति भी बढ़ाया। वही रूस ने श्रम शक्ति के ब्जाय प्रचंड मात्रा में पूंजी निवेश किया परंतु जापान जैसी समृद्ध अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सका।आज भी जापान में श्रमिक अपने अपने घरो के पास लघु यंत्रो पर कार्य किये नजर आते है और अमरीका और इंग्लैंड में इसकी मात्रा के बराबर है। अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए की उपभोग्य वस्तु का उत्पादन छोटे उद्योग में हो और उत्पादक और मूलभूत चीजो का बड़े उद्योग में हो।लोगो का क्रय-शक्ति बढ़ाना है तो जीवनावयश्यक वस्तुओ का उत्पादन वेग के साथ हो। समृद्धिशाली अर्थव्यवस्था का परिणाम तब ही मिलेगा जब सरकार विदेशी ऋण लेना बंद कर दे और घाटे के बजट बनाये(घाटे का बजट मतलब सरकार संचित राशि से अधिक व्यय कर देती हैजब देश को ऋण का अत्यधिक जरुरत हो तब ही ऋण की मंजूरी लेनी चाहिए और ऋण का कोई शर्त हो।सरकार लोगो के महँगाई भत्ता बढ़ाने के ब्जाय वस्तुओ के दामो पर स्थिरता रखे क्योंकि ये देखा गया है जैसे जैसे लोगो का वेतन बढ़ा है वैसे वैसे काला धन की रकम में भी वृद्धि हुई है।अतः समृद्धिशाली अर्थव्यवस्था का मतलब है मानव-शक्ति का पूर्ण उपयोग करना और हर मानव को रोजगार मुहैय्या करवाना जो असक्षम व्यक्ति है उसकी जीवनावयश्यक की जरूरते को पूरा करना।

                                  अर्थव्यवस्था का उद्देश्य :-

1)"शत हस्तसमहार सहस्रहस्त विकिर"अर्थात सैकड़ो हाथो से उत्पादन करो और हजारो हाथो से उसे बांटो।                                                                                                   

                                                                                                                                              :-अथर्ववेद

2)अर्थव्यवस्था का उद्देश्य असीम भोग नहीं -संयमित उपभोग होनी चाहिए। जैसे किसी का आय 100 रुपया है और उसका आवश्यकता 125 रुपया का है तो फिर  उसे 25 रुपया का दुःख होगा।इसलिए आय और आवश्यकताओ में अंतर काम होना चाहिए।

3)अर्थव्यवस्था का उद्देश्य समाजवाद और पूंजीवाद से हटकर समन्वयवाद होना

4)अर्थव्यवस्था का उद्देश्य प्रकृति का शोषण करते हुए उसका दोहन होना चाहिए जिसमे मानव का सर्वांगीण विकास हो।

5)अर्थव्यवस्था का उद्देश्य अधिक धन और अधिक लाभ नहीं होना चाहिए। अर्थव्यवस्था बढ़ानेके लिए नैतिक,सांस्कृतिक,आध्यात्मिक और भौतिक विकास सभी का होना जरुरी है।

                          निष्कर्ष :-

                     ' जातु कामः काम्यानामुपभोगेन शाम्यति'अर्थात

 लालसाएं भोग से तृप्त नहीं होती अधिक भोग करने से एक नए लालसाएं मार्ग पर तुरंत जाती है। आज आवश्यकताओ को देखकर उत्पादन नहीं होता परंतु उत्पादित वस्तुओ के उपरांत हमारी आवश्यकताओ को जगाया जाता है। आर्थिक स्वतंत्रता का सही अर्थ तभी होगा जब हमारी आवश्यकताओ को देखते हुए उत्पादन हो। आवश्यकताओ और उत्पादन में संयम रहे वही प्रकृति के साथ शोषण नहीं दोहन हो।


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deendayal Vichar Darshan


1 comment:

  1. thouhts r really....gud..nd skill of writing nd words used r awesome..cngrats..bro..

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