(यमुना की पीड़ा)
क्या देख रहा है मुझकों तू, मैं यमुना हूं मैली सी,
किसी युग में मैं भी, रहती थी आनंदी सी।
यमुनोत्री से निकल कर मैं,प्रयाग में मिल जाती हु,
और साथ-साथ कई बहनों को,नई जीवन दे जाती हूं।
मैं ही यमुना ,मैं ही जमुना, कालिंदी और सूर्यसूता,
मेरे तट पर न जाने कितने संतो ने चंडी पाठ पढ़ा।
श्याम वर्ण सी पैदा हुई, ब्रज मंडल की रानी हूं
कृष्ण की भक्ति करती हूं, बस कृष्णा की पटरानी हु।
आज हाल देखकर मेरा ये, क्यों तू विचलित सा नहीं होता?
न जाने कितने नाले, और कचड़े का प्रवाह मुझमे होती।
मैं ही वो यमुना हु, जो कालिया नाग का विष पिया,
और न जाने कितने लोगों का, मैंने अनुरोध लिया।
पहले कृष्ण के मुरली रागों से, खूब झूमा करती थी,
आज प्रदूषण के कहर से, खुद को कोसने लगती हूं।
माँगती हूं तुझसे एक वचन, तुम मेरा एक उपकार करो,
मेरे जल को, मेरे तट को, पुनः त्वरित उद्धार करो।
फिर अपने लहरों से तुझको, दरिया का बोध कराऊँगी, साथ-साथ गाँव-नगरों को, स्वच्छ बनाकर जाऊंगी।
:-रौशन
क्या देख रहा है मुझकों तू, मैं यमुना हूं मैली सी,
किसी युग में मैं भी, रहती थी आनंदी सी।
यमुनोत्री से निकल कर मैं,प्रयाग में मिल जाती हु,
और साथ-साथ कई बहनों को,नई जीवन दे जाती हूं।
मैं ही यमुना ,मैं ही जमुना, कालिंदी और सूर्यसूता,
मेरे तट पर न जाने कितने संतो ने चंडी पाठ पढ़ा।
श्याम वर्ण सी पैदा हुई, ब्रज मंडल की रानी हूं
कृष्ण की भक्ति करती हूं, बस कृष्णा की पटरानी हु।
आज हाल देखकर मेरा ये, क्यों तू विचलित सा नहीं होता?
न जाने कितने नाले, और कचड़े का प्रवाह मुझमे होती।
मैं ही वो यमुना हु, जो कालिया नाग का विष पिया,
और न जाने कितने लोगों का, मैंने अनुरोध लिया।
पहले कृष्ण के मुरली रागों से, खूब झूमा करती थी,
आज प्रदूषण के कहर से, खुद को कोसने लगती हूं।
माँगती हूं तुझसे एक वचन, तुम मेरा एक उपकार करो,
मेरे जल को, मेरे तट को, पुनः त्वरित उद्धार करो।
फिर अपने लहरों से तुझको, दरिया का बोध कराऊँगी, साथ-साथ गाँव-नगरों को, स्वच्छ बनाकर जाऊंगी।
:-रौशन
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