Friday, February 2, 2018

नव वर्ष 2075 एवं वसंत ऋतु पर मेरे द्वारा लिखी कविता


हे सखा! माघ बाद तेरा अवलोकन हुआ,
तेरे स्पर्श से मानो, सम्पूर्ण काया सक्रिय हुआ।
वृक्ष भी नव रूप धारण किये किकोल रहा है,
जैसे नूतन वर्ष अभिनंदन आन पड़ा है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का हो रहा आरम्भ,
और साथ एक नव युग का उत्साह-उमंग।
हर खेत और बाग़ हो रहा स्वर्ण जैसा अलंकृत,
 प्रकृति का आँगन भी हो गया सुशोभित।
पक्षियों ने भी 'राग बसंत' का बाण छोड़ा है,
नव वर्ष के गीतों से आया नया सबेरा है।
यह देख पर्वतराज हिमालय भी पिघल गया,
जान्हवी से बिछुड़ने का दुःख उसे भी हुआ।
ठंड से ठिठुरे विहंग, अब उड़ने का बहाना ढूंढ रहे,
जंगलों के सारे वृक्ष भी, अब नव पल्लव पाल रहे।
अंधकार भी अपना साम्राज्य समेटने लगा,
ऋतुओं का राजा, वसंत जो आ गया।
                                                       :- रौशन

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